बरखा बरस रही है झर-झर.
खुले में मज़े से तू है नहाता,
पर पीने को जब नही होता पानी,
तब क्यों है तू झगड़ता?
पहले तो बचाया नही, अब क्यों तू रोता है?
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
बदलते हुए मौसम को महसूस कर,
सरद, गरम का नहीं रहा भरोसा,
सड़क,नदी,नाले,झरने,नालियां,पहाड़,
हर जगह तूने कचरा ठूंसा,
तापमान के तेवर देख,ऊपरवाले से अरदास क्यों करता है?
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
सूनी गलियां,सूनी राहें,
बदमाशों की टोलियाँ,
बिना बोले सहमे से, झेलते,
हाकिमों सरकारों की गोलियां,
गुप्त,खुली जगहों पर गन्दा धंधा होता है,
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
पुरा संस्कृतियों, विरासतों पर,
हंस-थूककर कृते हम गंदे,
बीच बाज़ार, गली चौराहों पर,
इज़्ज़त हमारी छेड़ते, हम लफंगे,
इतना सब-कुछ देखकर भी तू आँखें मूंदकर चलता है,
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
जनता के प्रतिनिधि हैं ये,
जनता को ही हैं चूसते,
एक- दूसरे को गालियाँ हैं देते,
देखो सदन को तार-तार ये करते,
देख-सुनकर बुरा लगता है तुझे पर वोट डालने कौन जाता है?
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
रिश्वत के तो क्या हैं कहने,हाकिम से दस तक सब हैं लेते,
खादी,खाकी का तो ईमान है ये,
क्योंकि बात-बात पर हम हैं देते,
कोई खुले में तो कोई टेबल के नीचे से लेता-देता है
देखो क्या-क्या होता है,जब शहर हमारा सोता है
mast hai bhai
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